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।।अथश्री जगद्धात्री देव्यै नमः।।

माँ जगद्धात्री की असीम कृपा के कारण ही स्वर्गीय कमलाकांत झा, पिता- स्वर्गीय हीरा झा, ग्राम एवं पोस्ट - सैदापुर, जिला गोड्डाझारखंड के जन्मोत्सव के शुभ अवसर पर सन् उन्नीस सौ एक (1901 ई०) से प्रतिवर्ष माँ की भव्य पूजा का समारोह मनाया जा रहा है।वस्तुतः यह पूजा-अर्चना कार्त्तिक महीना के शुक्ल पक्ष की अष्टमी, नवमी एवं दशमी तिथि को की जाती है।

स्वर्गीय कमलाकांत झा के जन्म के पीछे की सत्य कथा का विवरण इस प्रकार है ।


स्वर्गीय हीरा झा सन् 1882 में कोलकाता विश्वविद्यालय से विधि विषय में स्नातक की डिग्री प्राप्त किए थे और उन्होंने वहीं उच्चन्यायालय में वकालत शुरु किया। उन्हें बंगाल के चंदन नगर में माँ जगद्धात्री की पूजा में शामिल होने का आमंत्रण मिला और वे वहांउपस्थित हुए। उन्होंने वहां पर माता की पूजा से प्रभावित होकर पंडित महोदय से मां जगद्धात्री की पूजा का रहस्य पूछा। पंडितजी नेरहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि माँ शक्ति रूपा, शांति रूपा एवं संतानदायिनी हैं। उसी समय जब माँ अपने दिव्य रूप में थी, उन्होंने पूरीआस्था एवं विश्वास से पुत्र की कामना की एवं बोले कि यदि मुझे इनकी कृपा से पुत्र रत्न की प्राप्ति हो तो मैं भी धूमधाम से हर वर्ष मांकी पूजा करूंगा। माँ की भावमयी प्रतिमा जब विसर्जन के वक्त गंगा नदी के पवित्र प्रवाह में समा रही थी। उस समय हीरा झा दम्पत्ति का हृदय माता केअद्भुत स्वरूप का भक्तिमय व पुत्र कामना से उद्बुध भाव से आप्लावित हो दर्शन में तल्लीन था । तभी अकस्मात् श्रीमती हीरा झा केआंचल में एक श्रद्धा का पुष्प गिरा, जो शायद मनोकामना के फलवती होने का शुचिर्संकेत ही था । तत्पश्चात् सन् उन्नीस सौ ईस्वी(1900) में श्री कमलाकांत झा का जन्म हुआ। और उन्नीस सौ एक ईस्वी (1901) से माँ जगद्धात्री की पूजा भव्य मंदिर ग्राम - सैदापुर(गोड्डा) में की जा रही है। स्वर्गीय कमलाकांत झा का जन्म सन् 1900 ईसवी में एवं मृत्यु 1968 ईस्वी में हुआ । उनका छह पुत्रों एवं एक पुत्री से सुसज्जितपरिवार रहा । जो निम्नवत् है : 1. कृष्ण कांत झा 2. विष्णुकांत झा 3. निशि कांत झा 4.अवनी कांत झा 5. सरोज कांत झा 6. श्यामाकांत झा तथा 7. शारदा देवी (सुपुत्री) ।

पूजा का कार्यक्रम


कार्तिक महीना के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन मां अपने आसन पर विराजमान होती हैं। शास्त्र के अनुसार मां हिमालय पहाड़ सेसपरिवार पूजा लेने के लिए आती हैं । उस समय का दृश्य अत्यंत ही शोभनीय एवं मनभावन होता है। बैंड पार्टी की धुन , शहनाई वादन, डेकोरेशन एवं भक्तजनों की भीड़ भव्य मंदिर की शोभा बढ़ा देता है। पूजा के कार्यक्रम में सम्मिलित लोग संयम से रहते हैं ; साथ ही साथजितने भी स्त्री-पुरुष मां से अपनी कामना उम्मीद रखते हैं वो भी संयमित रहते हैं। दूसरे दिन अक्षय नवमी को त्रिकाल पूजा सुबह से ही शुरू हो जाती है। यह पूजा तांत्रिक पूजा है इस पूजा में भगवती से कामनाके लिए जो संयम पर रहते हैं; वे तीनों पूजा में मंदिर में मां पर ध्यान लगाकर उपस्थित होते हैं। तीनों पूजा समापन होने के बाद हवन होताहै, उसके बाद संयम वालों को आचार्य के द्वारा फूल दिया जाता है । वह फलीभूत होते हैं ऐसी परंपरा एवं विश्वास है। मातृ पूजा के इस त्रिदिवसीय उत्सव में दिन की शुरूआत पूजा अर्चना से होती है।दिन ज्यों ज्यों चढ़ती है भक्तों की भीड़ भव्य मेलका रूप लेती जाती है । संध्या से अगले दिन की सुबह के आकर्षण का केन्द्र रंगमंचीय रंगारंग सांस्कृतिक व सांगीतिक कार्यक्रम बनजाता रहा है ।पूरे गांव में समाज के लोग कार्यक्रम को सफल बनाने में सक्रिय रहते हैं तथा प्रशासन के तरफ से पुलिस बल की तैनातीरहती है। तीसरे दिन दशमी को मां की पूजा का विसर्जन होता है । इसी तिथि की रात्रि को प्रतिमा के जल में प्रवाहित करने की परम्परा थी।जिसमें रात्रि होने के कारण अपेक्षाकृत कम भक्तजनों की भीड़ होती थी । दैवयोग से कुछ वर्षों पूर्व इसी तिथि की रात्रि में प्रलयंकारी वृष्टि के कारण प्रतिमा का जल में विसर्जन नहीं हो पाया।परिणामस्वरूप एकादशी तिथि की सुबह भव्य शोभायात्रा के साथ प्रतिमा को नदी में विसर्जित किया गया।यह पूर्व की अपेक्षा अधिकभक्तिमय एवं मनोहारी दृश्य था। "वर्त्तमान के प्रलय में भविष्य के नवीन व स्वस्थ सृष्टि का अंकुर विद्यमान होता है।" तभी से एकादशी तिथि को प्रतिमा के साथ नदीतक शोभायात्रा निकलती है तत्पश्चात प्रतिमा को जल में प्रवाहित कर दिया जाता है। फिर सभी भक्तजन मंदिर में वापस होकर प्रणामकरते हैं तथा प्रसाद का वितरण होता है । माँ जगद्धात्री की पूजा एक पारिवारिक पूजा है जो हमलोग हर वर्ष धूमधाम से मनाते आ रहे हैं माँ से प्रार्थना करता हूं कि पूरेविश्व का कल्याण करें। ।।जय माँ जगत जननी।। निवेदक समस्त कमलाकांत परिवार (सैदापुर)

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